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Wednesday, November 30, 2022

स्व. डा. शम्भु नाथ सिंह की प्रसिद्धतम गीत रचना : समय की शिला पर… #Realviewnews

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शम्भुनाथ सिंह समकालीन कविता के सशक्त हस्ताक्षर है । एक ऐसे प्रातिभ रचनाकर, जिन्होंने साहित्य की प्रायः सभी विधाओं को अपने लेखन से समृद्ध किया है । कविता विशेषतः गीत कविता को युग सापेक्ष नवीनता से भरकर उसे पारम्परिकता से बाहर निकालने और टटका बना देने में शम्भुनाथ जितनी सफलता उनके समकालीन किसी अन्य रचनाकार को नहीं प्राप्त हुई । सच कहा जाय तो कविता को नयी कविता बना देने में जो योगदान अज्ञेय का है, वही योगदान शम्भुनाथ सिंह का गीत को नवगीत बना देने में है ।
प्रस्तुत गीत में समय एक चित्रपट है । इस चित्रपट पर सृष्टि सौंदर्य के अनेक चित्र बनते मिटते रहते है । यें चित्र जब समय की शिला पर निर्मित होते है, तो दुरुहता अन्योन्याश्रित हो जाती है, क्योंकि यह शिला अत्यंत ही कठिन है । इसलिए इस पर बनने वाला चित्र भी कड़ी चोट और दर्द की अनेक अनुभूतियों से उत्सर्जित होकर कठिनाई से बनता है ।

समय की शिला पर मधुर चित्र कितने
किसी ने बनाये, किसी ने मिटायें !

किसी ने लिखी आंसुओं से कहानी
किसी ने पढ़ा किंतु दो बूंद पानी
इसी में गयें बीत दिन जिंदगी के
गयी घुल जवानी गयी मिट निशानी

विकल सिंधु से साध के मेघ कितने
धरा ने उठाये, गगन ने गिराये !

शलभ ने शिखा को सदा ध्येय माना
किसी को लगा यह मरण का बहाना
शलभ मिट न पाया शलभ जल पाया
तिमिर में उसे पर मिला क्या ठिकाना

प्रणय पंथ पर प्यार के दीप कितने
मिलन ने जलायें विरह ने बुझायें !

जलधि ने गगन चित्र खींचे नयन में
उतरती हुयी उर्वशी देख घन में
अचल किंतु चलचित्र वे हो न पायें
कि सहसा बुझी रूप की ज्योति क्षण में !

जलद पत्र पर इंद्रधनु रंग कितने
किरण ने सजायें पवन ने उड़ाये !

भटकती हुई राह में वंचना की
रुकी श्रान्त हो जब लहर चेतना की,
तिमिर आवरण ज्योति का वर बना जब
की टूटी तभी शृंखला साधना की ।

नयन प्रण में रूप के स्वप्न कितने
निशा ने जगाये, उषा ने सुलाये !

सुरभि की अनिल – पंख पर मौन भाषा
उड़ी वंदना की जगी सुप्त आशा,
तुहिन-बिंदु बन कर बिखर पर गये स्वर

किसी के चरण पर वरण फूल कितने
लता ने चढ़ाये, लहर ने बहाये !
समय की शिला पर मधुर चित्र कितने,
किसी ने बनाये, किसी ने मिटाये !

( साभार – स्व. डा. शंभूनाथ सिंह की गीति रचना से )

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