33.1 C
Delhi
Monday, August 8, 2022

बिहार में का बा, जाति के नाम पर नरसंहार ? #Realviewnews

जरूर पढ़े

कांग्रेस ने आरती सिंह को बनाया बदलापुर विधान सभा से प्रत्याशी #Realviewnews

पूर्व सांसद स्व. कमला प्रसाद सिंह की हैं पौत्रवधु 2017 में एक भी सीट नहीं जीत पायी थीं कांग्रेस रियल व्यू...

जौनपुर में बसपा प्रत्याशियों के नाम पर अभी भी कर रही मंथन  #Realviewnews

रियल व्यू न्यूज, जौनपुर । भाजपा, सपा, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी, वीआईपी जैसी पार्टियों ने जगह-जगह अपने प्रत्याशी...

जौनपुर के प्रतिष्ठित फर्म कीर्ति कुंज और गहना कोठी पर आयकर विभाग का छापा #Realviewnews

लंबी चल सकती है जांच की कार्यवाही रियल व्यू न्यूज, जौनपुर । शहर के बड़े सराफा कारोबारी और प्रतिष्ठित कीर्ति...

वारीन्द्र पाण्डेय

बिहार में विधानसभा 2020 का चुनाव अपने पूरे शबाब पर है । सभी पार्टियां अपने अपने दांव पेंच आजमा रही हैं । किंतु आजादी के इतने वर्षों बाद भी बिहार में जाति की राजनीति आज भी कायम है। भोजपुर का बेलाउर गांव हों या आरा का गिध्दा गांव , जहां महादलितों की बस्ती आज भी शुद्ध पानी नहीं पाती हैं । जबकि कर्पूरी ठाकुर से लगायत वी पी सिन्हा तक ,सभी ने बिहार के दलितों, शोषितों, वंचितों के दशा परिवर्तन की लड़ाई लड़ने का दावा करते हैं । यह सभी नेता वोट के लिए दलितों की आवाज राजनीतिक गलियारों में चीख चीख कर उठाते रहे , किंतु बिहार के इन गरीबों की दशा आज भी जस की तस है । कमोवेश सभी दलों ने बिहार की पिछड़ों और दलितों के बल पर राज किया । जातियों के आधार पर खूनी जंग ने बिहार में एक नये रक्त चरित्र का निर्माण किया । जिसकी चर्चा हम आगे करेगें । वर्तमान में सुशासन बाबू के नाम से ख्यात सत्तासीन नीतीश कुमार की सरकार पिछले चुनाव में , भाजपा नीत राजग से नाता तोड़ कर राजद की लालटेन थाम ली थी । लालटेन की रोशनी में नीतीश के तीर सटीक निशाने पर जा लगें । महादलितों के नये मशीहा जीतन राम मांझी के अलग पार्टी बनाकर चुनाव लड़ने के बावजूद , बिहार की नब्ज के राजनीतिक एमबीबीएस लालू यादव ने सभी समीकरण को ध्वस्त कर, जातीय गठजोड़ के बल पर अपने धुर विरोधी नीतीश कुमार को सत्ता के सिंहासन पर बैठा दिया । बदले में राजनीतिक दांव पेंच में अनाड़ी अपने दोनों बेटों , तेजप्रताप यादव व तेजस्वी यादव को कैबिनेट मंत्री सहित कई वफादारों को ओहदा दिलाया ।
किंतु लंबे समय तक यह बेमेल गठबंधन टिक नहीं पाया । एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोपों के बीच समता पार्टी और राजद की गाड़ी एकबार फिर पलट गयी । दोनों दलों की रार का फायदा बीजेपी को मिलना तय था । नतीजा यह रहा कि पुनः बिहार कि राजनीति में भाजपा से गलबहिया कर नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बनें रहे । इस बार 2020 का बिहार विधानसभा चुनाव को वहां की जनता , हिसाब किताब के आंकड़े में तौलना चाहती है । जनता इस बार नेताओं से पूछ रही है कि आजादी के सत्तर सालों बाद भी बिहार का विकास क्यों नहीं दिखता। जातियों को आपस में बांट कर नेताओं ने सत्तासुख तों खूब भोगा किंतु जनता आज भी रोजगार की तलाश में देश के अन्य हिस्सों में दिहाड़ी मजदूर बन कर घूम रही है , क्यों ? बेबसी लाचारी में बिहार की मेहतर , जोलहा , मुसहर , वनवासी , पासी , पासवान , मदारी , दफाली , दर्जी , अब्दल , पठानी, बोथीयार , धुनिया , गद्दी , इद्रीसी , कलार , शरीफ , कलंदर , कसाब अदल , ठकुराइ, कागजी, चिक आदी महादलित आज भी बिहार के अंदर एक कमरे में ग्यारह लोगों के साथ जीवन बिताते हैं , तों कुछ परिवार सिरकि तम्ब्बू के नीचे दिन गुजार रहा है क्यों ? आखिर कोई नेता या उनका दल यह क्यों नहीं बताता की बिहार को जातीय खेमों में बांट कर कब तक उनके हिस्से का सुख उनसे दूर रखा जाएगा । शायद इसी लिए बिहार का आम जनमानस कह रहा है कि गुंडई , जोर जबरदस्ती , अपहरण , फिरौती , नक्सली , डकैती , बेहाली , बदहाली , बाढ़ और तबाही के अलावा ..का ..बा ..बिहार में का बा ? ? ? ? ? ?
बात चली है तों यह भी बता दें कि बिहार ने एक से बढ़कर एक जुझारी और कर्मठ नेता दिया है देश को । बाबू राजेंद्र प्रसाद , लालबहादुर शास्त्री , लोकनायक जयप्रकाश , राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘ दिनकर ‘ कर्पूरी ठाकुर , बाबू जगजीवन राम सहित कई ऐसे नाम हैं , जो बिहार के बागबान रहे । बिहार ने ही देश को पहला दलित मुख्यमंत्री व उप प्रधानमंत्री दिया था । इन्होंने देश को बहुत कुछ दिया है । तों वही बिहार की उपलब्धियों को रक्तचरित्र में बदलने का पूरा श्रेय 1977 के समय से उपजी जातीय हिंसा को दिया जाता है । इसी साल बिहार के भोजपुर , बेलाउर गांव में पहली हत्या हुयी जो जातिगत थी । बता दें कि बिहार में जब भी चुनाव आता है तों वोट बैंक के लिए समूचा बिहार जातियों में बंट जाता है । यहां जाति कि लड़ाई में बंदूक की गोलियों से लाशों का ढ़ेर लगा कर जातीय उन्माद भड़काया गया । शरद यादव , लालू यादव , रामविलास पासवान , नीतीश कुमार , हुकुमदेव नारायण , जीतनराम मांझी जैसे एक से बढ़कर एक विभिन्न जातियों के नेता हुए , जिनका मानना था की लोकतंत्र में अपनी अपनी हिस्सेदारी के लिए आवाज उठाना गलत नहीं है । इस लिए केवल बिहार पर जातीय राजनीती का आरोप लगाना भी गलत है । यह तों अब पूरे देश की समस्या बन गयी है । अब पिछड़े एवं दलितों का हिस्सा देना पड़ेगा । जिसकी आवाज बिहार में उठी तों उसे ताकत से दबाना गलत था । जिसके परिणाम स्वरूप लोगों ने आंदोलन किया । मीडिया वालों ने ऐसे आंदोलनों को जातीय जोड़ तोड़ करार दे दीया ।
वैसे नेता कुछ भी कहें , पर सच्चाई यही है कि राजसत्ता का सुख पाने के लिए बिहार में चुनाव आते ही जातीय गणित साधी जाती है । गठबंधन के इस युग में सभी दल जातियों के आधार पर काम करने लगते हैं । और सत्ता में आने के बाद उसी प्रकार काम भी करते हैं । यही कारण है की जाती की अंधी धारा में वह कर गलत लोगों को वोट करने के कारण बिहार का विकास सही तरीके से नहीं हों पाया है । शसस्त्र सेना , रणवीर सेना , बावन संगठन , लोरिक सेना , कामरेड सेना आदी में बंटकर व आरक्षण , संरक्षण के जाल में उलझ कर बिहार में ना खेती बची न रोजगार है , सब बेकार व बर्बाद । महादलितो के नाम पर तमाम जन कल्याणकारी योजना नीतीश सरकार ने चलायी है । पर कागजों में छोड़ बिहार में सब कुछ पहले जैसा ही है । आज भी उन गांवों में जहां जातीय हिंसा ने लाशों का ढ़ेर लगा दिया था , किंतु बुनियादी जरुरत जस की तस है । उल्लेखनीय है कि 1992 में गया के अंदर 19 सवर्णों की हत्या जमीन की लड़ाई में जातिगत आधार पर हुयी थी । 1997 में जहानाबाद के लक्ष्मणपुर बांधे में 58 दलितों की हत्या भी जातीय हिंसा का प्रतिफल था । 1999 में मार्क्सवादियों ने 25 भूमिहारों की हत्या कर दी थी । 1999 में ही 23 दलितों की हत्या । 2000 में बिहार के औरंगाबाद में 35 पिछड़ों व दलितों की हत्या , यह सब जातीय लड़ाई के साथ वोट बैंक की घिनौनी राजनीती द्वारा प्रायोजित कही गयीं । 75 वर्षीय ब्रह्ममेस्वर मुखिया की हत्या इन्हीं जातिगत हिंसा का पुराना बदला था । बिहार की सियासत में सत्ता किसे मिलेगी , मुख्यमंत्री कौन बनेगा यह कह पाना अभी मुश्किल है । इस बार बिहार का चुनाव लालू एवं रामविलास पासवान के बिना मैदान में उतरे राजनीतिज्ञों का रण बना है जहां इन दोनों के उतराधिकारी भाजपा , कांग्रेस , नीतीश , मांझी जैसे मजे नेताओं की बिसात पर शतरंज का दांव खेल रहे हैं । जहां अबकी बार युवा सरकार के नारे पर तेजस्वी का तेज चमक रहा हैं , वही राजग से छिटक कर पिता का श्राद्ध कर रहे चिराग बिहार का चिराग बनान चाहते हैं । देश अपनी रफ्तार से चल रहा है , किंतु बिहार अपनी रफ्तार से चलता है । जहां विकास पर जाति हमेशा भारी पड़ती है ।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

पॉपुलर

शिक्षा को अवसर में बदलने की चुनौती #Realviewnews

रीयल व्यू न्यूज ।  (शिक्षक दिवस पर आमंत्रित लेख)   लेख - अनिल यादव ( मैनेजमेंट गुरु )   लंबे अरसे के बाद आई...

अन्य

- Advertisement -

खबरे आज की

More Articles Like This