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Monday, December 5, 2022

पुरुष कभी नहीं हो सकता स्त्री से श्रेष्ठ शिष्य #Realviewnews

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अद्भुत होती है स्त्री की समर्पण क्षमता

वारीन्द्र पाण्डेय

प्रख्यात तर्क शास्त्री ओशो ने सिद्ध किया है कि स्त्री जैसा सर्वोत्तम और आज्ञाकारी शिष्य अन्य कोई नहीं हों सकता । जो समर्पण स्त्री में है, वह किसी पुरुष में नहीं है। आज्ञा का अनुशीलन एवं सीखने कि प्रवित्ति जिस संपूर्ण भाव से स्त्री अंगीकार कर लेती है, ग्रहण कर लेती है, उस तरह से कोई पुरुष कभी अंगीकार नहीं कर पाता, ग्रहण नहीं कर पाता।

स्त्री जब कोई शर्त स्वीकार कर लेती है, तो फिर उसमें रंचमात्र भी उसके भीतर कोई विवाद नहीं होता है, कोई संदेह नहीं होता है, क्योंकी उसकी आस्था परिपूर्ण है।

ओशो ने कहा है कि स्त्री मन जब किसी के विचार को स्वीकार कर लेती है, तो वह विचार भी उसके गर्भ में प्रवेश कर जाता है। और वह उस विचार को , गर्भ की भांति अपने भीतर पोसने लगती है।वही ठीक इसके विपरीत
पुरुष अगर स्वीकार भी करता है, तो बड़ी जद्दो-जहद करता है, बड़े संदेह खड़ा करता है, बड़े प्रश्न उठाता है। और अगर झुकता भी है, तो वह यही कह कर झुकता है कि आधे मन से झुक रहा हूँ, पूरे से नहीं।
शिष्यत्व की जिस ऊंचाई पर स्त्रियां पहुंच सकती हैं, पुरुष नहीं पहुंच सकते । क्योंकि स्वीकार एवं समर्पण की जिस निकटता की ऊंचाई पर स्त्रियां पहुंच सकती हैं, पुरुष नहीं पहुंच सकता ।
और ओशो ने यह भी माना हैं की स्त्रियां अदभुत रूप से, गहन रूप से, श्रेष्ठतम रूप से, शिष्य बन सकती हैं, किंतु स्त्री गुरु नहीं बन सकतीं,। क्योंकि शिष्य का जो गुण है, वही गुरु के लिए बाधा है।

गुरु का तो सारा कृत्य ही आक्रमण है। वह तो मानव की अज्ञानता को तोड़ेगा, मिटाएगा, नष्ट करेगा। क्योंकि पुराने का नाश नही हों, तो नए का जन्म नहीं हो सकता है। इस लिए गुरु तो अनिवार्य रूप से विध्वंसक है; क्योंकि वह सृजन लाता है। वह मानव को मृत्यु के सत्य से परिचय कराता है ।और मृत्यु आपको नया जीवन न देता है ।

दूसरी तरफ स्त्री में वह क्षमता नहीं है। वह आक्रमण नहीं कर सकती, समर्पण कर सकती है। समर्पण उसे शिष्यत्व में तो बहुत ऊंचाई पर ले जाता है।
लेकिन स्त्री कितनी ही बड़ी शिष्या हो जाए, वह गुरु नहीं बन सकती। उसका शिष्य होने का जो गुणधर्म है, जो खूबी है, वही तो बाधा बन जाती है कि वह गुरु नहीं हो सकती है।

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