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Thursday, April 29, 2021

नवरात्रि विशेष : मध्यम चरित्र की संक्षिप्त कथा #Realviewnews

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इस चरित्र में ऋषि ने राजा सुरथ तथा समाधि नाम के वैश्य के प्रति मोह जनित सकामोपासना द्वारा अर्जित फलोपभोग के निराकरण के लिए निष्कामोपासना का उपदेश किया है –

प्राचीन काल में महिष नामक एक अति बलवान असुर उत्पन्न हुआ। वह अपनी शक्ति से इन्द्र, सूर्य, चन्द्र, यम, वरूण, अग्नि, वायु तथा अन्य सुरों को हटाकर स्वयं इन्द्र बन गया और उसने समस्त देवताओं को स्वर्ग से निकाल बाहर किया। अपने स्वर्ग सुख भोग ऐश्वर्य से वंचित होकर दु:खी देवगण साधारण मनुष्यों की भाँति मर्त्यलोक में भटकने लगे। अन्त में व्याकुल होकर वे लोग ब्रह्माजी के साथ भगवान विष्णु और शिवजी के निकट गये और उनके शरणागत होकर उन्होंने अपनी कष्ट कथा कही।
देव वर्ग की करूण कहानी सुन लेने पर हरि – हर के मुख से महत्तेज प्रकट हुआ। इसके पश्चात् ब्रह्मा, इन्द्र, सूर्य, चन्द्र, यमादि देवताओं के शरीर से भी तेज निकला। यह यह सब एक होकर , तीनों लोकों को प्रकाशित करने वाली एक दिव्य देवी के रूप में परिणत हो गया।
विधि हरि-हर त्रिदेवों तथा अन्य प्रमुख सुरों ने अपने अपने अस्त्र-शस्त्रों में से दिव्य प्रकाशमयी उस तेजोमूर्ति को अमोघ अस्त्र-शस्त्र दिये। तब श्रीभगवती अट्टहास करने लगी। उनके उस शब्द से समस्त लोक कम्पायमान हो गये।
तब असुर राज महिष “आ: यह क्या है?” ऐसा कहता हुआ सम्पूर्ण असुरों को साथ लेकर उस शब्द की ओर दौड़ा। वहाँ पहुँच कर उसने उस महाशक्ति देवी को देखा, जिसकी कान्ति त्रैलोक्य में फैली है और जो अपनी सहस्र-भुजाओं से दिशाओं के चारों तरफ फैलकर स्थिर है। इसके पश्चात् असुर देवी से युद्ध करने लगे।
श्रीभगवती और उनके वाहन सिंह ने कई करोड़ असुर सैन्य का विनाश किया। तत्पश्चात् श्रीभगवती के द्वारा चिक्षुर,चामर, उदग्र,कराल, बाष्कल, ताम्र, अन्धक, अतिलोम, उग्रास्य, उग्रवीर्य, महाहनु, बिडालास्य, महासुर, दुर्धर और दुर्मुख – चौदह असुर सेनापति मारे गये। अन्त में महिषासुर, भैंसा, हाथी, मनुष्यादि के रूप धारण करके श्रीभगवती से युद्ध करने लगा और मारा गया।
अपने समग्र शत्रुओं के मारे जाने पर देवगण ने प्रसन्न होकर आद्या शक्ति की स्तुति की और वर माँगा –
“जब – जब हम लोग विपद्ग्रस्त हों तब – तब आप हमें आपदाओं से विमुक्त करें और जो मनुष्य आपके इस पवित्र चरित्र को प्रेमपूर्वक पढे़ं और सुनें वे सम्पूर्ण सुख और ऐश्वर्यों से सम्पन्न हो।”
श्रीभगवती देवताओं को ईप्सित वरदान देकर अन्तर्धान हो गई। इस चरित्र में मेधा ऋषि ने इन्द्रादि देवगण के राज्याधिकार का अपहरण, आत्म-शक्ति द्वारा उनके दुखों का निराकरण तथा पुन: स्वराज्य प्राप्ति का वर्णन करके सुरथ राजा के शोक मोह के निवारण के लिए उसी आत्म-शक्ति की भक्ति का उपदेश दिया है ।

पं. संदीप दूबे

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