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Sunday, March 7, 2021

ज्योतिबा राव फूले जी की पुण्यतिथि पर विशेष : ” शिक्षा ही समाज में फैली हुई विसंगतियों को दूर कर सकती है “

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लेख – अनिल यादव ( मैनेजमेंट गुरु )

11 अप्रैल 1827 ई. कों महाराष्ट्र के खानवाडी में एक माली परिवार में जन्मे ज्योतिराव फुले भारत के महान व्यक्तित्वों में से एक हैं। ये एक समाज सुधारक, लेखक, दार्शनिक, विचारक, क्रान्तिकारी के साथ अनन्य प्रतिभाओं के धनी थे। कम उम्र में ही इनके सर से माँ का साया उठ गया था। इनका लालन-पालन इनके पिता की मौसेरी बहन सगुना बाई ने किया था। इनके परिवार का पैत्रिक कार्य बागवानी करना और फूल मालाएँ बनाकर बेचना था। उनके इसी कार्य से इनका उपनाम फुले हो गया। ज्योतिराव के बचपन के समय में समाजिक पिछड़ेपन के कारण, शिक्षा का महत्व भी बहुत कम व हिन्दू समाज में जातिगत भेदभाव भी बहुत ज्यादा था। इसका सामना ज्योतिबा फूले जी को प्रारम्भिक शिक्षा के दौरान स्कूल में करना पड़ा और एक समय ऐसा आया कि सामाजिक रूढ़िवादिता के कारण फूले जी को स्कूल छोड़कर घर बैठना पड़ा । तब सगुना बाई ने ज्योतिबा को घर पर ही पढ़ाना शुरू कर दिया। और स्थिति ऐसी रही कि ज्योतिबा कों दिन में खेतों पर काम करते हुए रात्रि में स्वाध्याय करने लगे ।
ज्योतिबा फुले ने बहुत ही कम आयु में सामाजिक भेदभाव का सामना किया। इसलिए उनका मन उद्देलित रहने लगा था। उनका मानना था कि धर्म को मानव के आत्मिक विकास का साधन होना चाहिए । ज्योतिबा ने सामाजिक भेद भाव को दूर करने के लिए और समझने के लिए रामानंद, रामानुज,कबीर,दादू,संत तुकाराम,गौतम बुद्ध, के साहित्य को पढ़ा। उन्होंने विल्सन जोन्स द्वारा हिन्दू धर्म की अंग्रेजी कृतियाँ गीता ,उपनिषद, पुराण आदि को भी पढ़ा। इन सभी पुस्तकों को पढ़कर उन्होंने अपने चिंतन को एक नया नई ऊंचाई पर पहुँचाया। वे समझ गए कि केवल शिक्षा ही समाज में फैली हुई इन विसंगतियों को दूर कर सकती हैं। पिछड़े व वंचित वर्ग और स्त्री शिक्षा के लिए उन्होंने इस वर्ग की लडकियों और लड़कों को अपने घर पर पढ़ाना शुरू कर दिया।
स्त्रियों की तत्कालीन दयनीय स्थिति से फुले जी बहुत व्याकुल और दुखी होते थे इसीलिए उन्होंने दृढ़ निश्चय किया कि वे समाज में क्रांतिकारी बदलाव लाकर ही रहेंगे। उनका मानना था कि यदि स्त्री शिक्षित होगी तो समाज शिक्षित होगा। क्योकिं बच्चे के लिए उसकी माँ ही प्राथमिक पाठशाला होती है। वही बच्चों में संस्कारों के बीज डालती है जो उसके जीवन भर काम आते हैं। वो ही समाज को एक नई दिशा दिखा सकती हैं। इसीलिए उन्होंने स्त्री शिक्षा पर विशेष जोर देते हुए 1951 में भारतीय इतिहास का प्रथम बालिका स्कूल में खोला और इसके बाद ज्योतिबा फुले ने अपनी धर्मपत्नी सावित्री बाई फुले को एक मिशनरीज स्कूल में पढ़ाने का प्रशिक्षण दिलाया। इस प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद सावित्री बाई फुले भारत की प्रथम प्रशिक्षित महिला शिक्षिका बनी।
गरीबो और निर्बल वर्ग को न्याय दिलाने के लिए ज्योतिबा ने ‘सत्यशोधक समाज’ 1873 मे स्थापित किया। उनकी समाजसेवा देखकर 1888 ई. में मुंबई की एक विशाल सभा में उन्हें ‘महात्मा’ की उपाधि दी। ज्योतिबा फुले ने सती प्रथा का विरोध किया और विधवाओं के विवाह कराने का अभियान चलाया। जिसके क्रम में उन्होंने अपने मित्र विष्णु शास्त्री पंडित का विवाह एक विधवा ब्राह्मणी से कराया।
जिस प्रकार यूरोप में कार्ल मार्क्स किसान-मजदूर आन्दोलन के प्रणेता थे। उसी प्रकार भारत में ज्योतिबा फुले किसान मजदूर आन्दोलन के जन्मदाता थे। उन्होने मजदूरों के काम के घंटो में कमी व अवकाश, बीच में एक घंटे का आराम,सफाई व्यवस्था आदि के कार्य मजदूरों के हितो में कराने में सफलता प्राप्त की।
महात्मा ज्योतिबा फूले एक ऐसे समाज सुधारक थें, जिन्होंने समाज कों नई दिशा और दशा प्रदान की । उन्होने सामाजिक बुराइयों और कुरीतियों कों हर संभव दूर करनें का प्रयास किया । उन्होने अपनी पत्नी कों प्रशिक्षित कर एक सफल महिला शिक्षक बनाया । उनका मानना था कि समाज में हर वर्ग कों शिक्षा का पूर्ण अधिकार है और उनको, उनके अधिकार से वंचित नही करना चाहिए ।

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