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Thursday, April 29, 2021

छठ पूजा : सूर्य उपासना का महापर्व #Realviewnews

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उगते सूर्य को अर्घ्य देनें गंगा तीरे पहुंचे व्रती

रियल व्यू न्यूज डेस्क l

उत्तर भारत के बिहार राज्य से शुरू हुआ छठ पूजा , आज संपूर्ण भारत सहित विदेशों में भी मनाया जारहा है । सूर्य उपासना का यह महापर्व अत्यंत कठिन नेम धर्म का व्रत माना जाता है । जिसमें व्रती महिला पुरुष दो दिन पूर्व से ही अपने घरों को लीप पोत कर शुद्ध करते हैं । इसके साथ ही अपने परिवार एवं रिश्तेदारों को एकत्रित कर पूजा का प्रसाद गंगाजल से बनाया जाता है । अर्घ अर्पित करने के एक दिन पूर्व लौउवा भात खाते हैं । इसे सूर्य षष्टि भी कहा जाता है । नदी के तट पर कमर भर पानी के भीतर खड़े होकर डूबते सूर्य को अर्घ देनें व्रती बाजे गांजे की धुन पर नाचते गाते , बांस की टोकरी में विभिन्न प्रकार के फलफूल , रोठ इत्यादि आदित्यनाथ को अर्पित कर अपनी मनोकामना निवेदित करते हैं । जहां अगली सुबह तक उसी प्रकार कमर भर पानी में खड़े होकर उगते सूर्यदेव को अर्घ देते हैं ।

शास्त्रों के अनुसार नदी या जलाशय के तीरे छठी माई का घाट बनाया जाता है । यहां ऊख से मंडप बना कर , हरे बांस की डलरी व सूप में नारियल , केला , सेव , अनार , नींबू , अमरूद , अनानास आदी विभिन्न प्रकृति प्रदत्त फलों से भरे टोकरों के साथ उषा और प्रत्युषा रूपी सूर्य की उपासना का विधान है । ऐसा माना जाता है की , मूल रूप से यह पुत्र प्राप्ति की कामना का महाव्रत है । वैसे किसी भी अभीष्ट की कामना व सफलता के लिए छठपूजा सर्वोतम पूजा है । महाराज दशरथ भी पुत्र कामना से पुत्रेष्टी यज्ञ कराया था । जिसमें सूर्यदेव की महपूजा की गयी । फल स्वरूप उन्हें चार पुत्र हुए ।
एक अन्य मान्यता के अनुसार कार्तिक मास की षष्ठी और सप्तमी की मध्य रात्रि में वेदमाता गायत्री माता का जन्म हुआ था । जिन्हें छठीं माता भी कहा गया । जो लोकमानस की रक्षा करती हैं । छठ पूजा इसी छठी माता की उपासना का महाव्रत है । गांवों से लगायत महानगरों तक , सर्वत्र छठ पूजा धूम धाम से मनाया जाता है । इस वर्ष कोविड 19 महामारी के चलते यह पूजा भी प्रभावित हुई है । किंतु आम जनमानस इस महामारी के बीच भी पूरे एहतियात के साथ छठ पूजा मना रहा है । जलाशयों के किनारे शुक्रवार की सुबह से ही व्रती जनों के परिजन घाटों की सफाई एवं मंडप बना रहे थे । घाटों पर भीड़ न इकट्ठा हों , इसके लिए शाम तीन बजे से ही व्रती महिला पुरुष जुटने लगें । जहां सूर्यदेव के अस्ताचलगामी होने का इंतजार कर रहे थे । नदी किनारे लोक धुनों पर थिरकते स्त्री पुरुष मंत्रमुग्ध कर देनें वाले लोक रंजक गीत गाकर थिरक रहे थे । जहां एक ही धुन सुनायी पड़ रही थी —

कांचही बांस के बहगिया, बहगी लचकत जाय …
उगा उगा उगा हो सूरूजदेव, भईली भोर भिनुसार ..
केलवा के पात पर उगैन सूरूजदेव, झांकें झुकें
केलवा जे फरेला घवदवा, ओपर सुआ मेडराय
सूगवा के मारवो धनुष से
सूगा गिरै मुरझाय
सुगनि जे रोवै ले वियोग से
आदित्य होऊँ न सहाय

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